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Mahamedia Magazine - October 2019


Mahamedia Magazine - October 2019
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुख्यालय में छह - सात सितंबर की रात संगीन थी। चंद्रायन-दो के उतरने के चरम चरण थे- वे आखिरी पंद्रह मिनट, अग्नि परीक्षा का आवेगमय अवसर, जिन्हें पहले ही आतंक करार दिया गया था, तीस कि.मी. की ऊंचाई से उतार प्रति घंटे गति 6,048, दो मिनट बाद गति 4,680, तीन मिनट बाद 4,320, छह मिनट बाद, 3600, दस मिनट बाद 535 ऊंचाई दस कि.मी. बारह मिनट बाद 187 ऊंचाई पांच कि.मी. एक दशमलव एक्यावन बजे विक्रम से संपर्क विच्छिन्न, चांद की सतह से सिर्फ दो कि.मी. दूरी पर दु:खों के पहाड़ का टूटना बनते-बनते इतिहास का इतश्री हो जाना, पल भर में आशाओं पर पानी फिर जाना, हथेलियों से सफलता का खिसक जाना- विस्मित तो करता है लेकिन विज्ञान में ऐसी विफलता विरल नहीं। चंद्रअभियान के पिछले छह दशकों में सफलता सिर्फ साठ फीसदी ही रही है। एक सौ नौ चंद्र अभियानों में इकसठ सफल रहे और अड़तालीस विफल।

अड़तालीस दिनों के अनवरत अभियान में अड़चने ही अड़चने आड़े आयीं लेकिन वैज्ञानिकों ने युक्तियों से मुश्किलों का मुकाबला किया। पृथ्वी और चांद की कथाओं में चंद्रयान की यात्रा को सुगम करने के लिए गुत्थियों का सफल हल सरल कदापि नहीं था। चांद की कक्षा में अंतिम पांचवां पड़ाव कम पेचींदा बिल्कुल नहीं था। प्रक्षेपण के बयालीसवें दिन चंद्रायन से विक्रम का विलगाव हुआ और ऐसा अलगाव आशानुकूल रहा अलगाव के बाद चांद के 119 कि. मी. ऊपर और 127 कि.मी. ऊपर की वृत्ताकार कक्षा में प्रतिष्ठापित किया गया। उसी कक्षा में प्रज्ञान और परिक्रमायान का गतिवेग शून्य दशमलव आठ मी. प्रति सेकेंड है। अभी तक इसरो को अंतरिक्ष में दो माडयूल अलग करने का कोई अनुभव नहीं था। इसरो अध्यक्ष के शिवन ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह बेहद जटिल प्रक्रिया रही, जिसमें पसीने तक बहाने की नौबत आ गयी लेकिन हिम्मते मर्दा मददे खुदा। दर असल 22 जुलाई से 14 अगस्त तक चंद्रयान को धरती की कक्षा में रखना पड़ा था। चंद्रयान धरती के कई चक्करों को लगाते हुए धीरे-धीरे चांद की ओर उन्मुख होता रहा। इसी प्रक्रिया से दूसरे चंद्रयान की पृथ्वी से दूरी बढ़ती गयी और चांद के करीब पहुंचने लगा पांच चक्करों को पूरा करने के पश्चात चंद्रयान दो के छठवें चक्कर में धरती की कक्षा से उन्मुक्त हो गया। इसी क्रम में 14 अगस्त रात के लगभग दो बजे इस पर विशेष बल प्रयोग किया गया, जिससे चंद्रयान-दो के रॉकेट का परिवर्तन हुआ। चंद्रयान में पहले से ही एक रॉकेट होता है, जिसकी सहायता से विशेष प्रज्वलन किया जाता है, जब उपग्रह पृथ्वी की कक्षा के समीप होता है। इसे ही ट्रांसलूनरइंजेक्शन कहा जाता है। इसके साथ ही एक और शब्द लूनर टांस्फर ट्रांजेक्टरी का प्रयोग किया जा रहा है। जिसका सीधा अर्थ होता है चंद्र स्थानांतरण प्रक्षेप पथ यानी चंद्रयान धरती की कक्षा छोड़कर चांद की तरफ अग्रसर होता है और जो रास्ता निर्धारित किया जाता है, इसी रास्ते को लूनर ट्रांसफर ट्रांजेक्टरी कहते हैं।

लेकिन यह प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। ऐसा सूक्ष्म काम निश्चित समय में निश्चित दिशा में अंजाम दिया जाता है। ये कार्य काफी दूरी से क्रियान्वित किए जाते हैं। बेंगलूरू के मिशन आपरेशंस कांप्लेक्स जो इसरो टेलीमेट्री ट्रेकिंग एंड कमांड नेटवर्क से जो इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क एंटीनाज व्यालालू स्थित से जुड़ा है। यानी धरती पर दो सौ छिहत्तर कि.मी. की दूरी से तय करनी होती है, जिसकी मंजिल तीन लाख चौरासी हजार कि.मी. दूरी पर स्थित चांद होता है, ऐसे में आपका अचूक निशाना ऐन वक्त पर लक्ष्य तक अचूक हो, अंदाजा लगाइए कि कितना दुष्कर हो सकता है। प्रक्षेपण से लेकर चांद तक के सफर के सारे चरण जोखिम भरे रहे। चांद की कक्षा तक सुरक्षित पहुंचना और फिर आहिस्ता आहिस्ता अवतरण करना-एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है- की तरह दुष्कर रहा है। चंद्रयान को प्रारंभिक 39 हजार कि.मी. प्रतिघंटा की रμतार दी गयी, जिसे चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद रμतार पर रोक लगायी गयी। सुगमता से इस रμतार को समझा जा सकता है कि इस गति से एक घंटे में कश्मीर से कन्याकुमारी तक छह चक्कर लगाए जा सकते थे। आहिस्ता अवतरण (सॉफ्ट लैडिंग) आसान नहीं होता। यह एक राष्ट्रीय सम्मान का विषय है।
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